जरूरत से ज्यादा अनाज उगाने के बावजूद क्यों है देश में भुखमरी, क्या अनाज की बर्बादी है वजह?

देश में चल रहा किसानों का विरोध-प्रदर्शन इस बात का गवाह है कि अन्नदाता यानी किसान जो कुछ भी पैदा करता है, उसे उसका उचित मूल्य नही मिलता. दूसरी तरफ ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) में भारत की रैंक 103वीं है. इन दोनों बातों के अलाव एक तीसरी चौंकाने वाली सच्चाई है भारत में अनाज की बर्बादी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) अक्सर ये बात दोहराते हैं कि कृषि उपज को स्टोर करने और वितरित करने की क्षमता पर तेजी से काम करने की जरूरत है. आंकड़े भी उनकी इस बात की गवाही देते हैं. भारत हर साल सस्ता या मुफ्त अनाज मुहैया कराने पर करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये खर्च करता है. जबकि, 2016 में एक स्टडी में अनुमान लगाया गया कि भारत में अनाज की बर्बादी के चलते सालाना 92,651 करोड़ रुपये का नुकसान होता है.

दशकों से जब भी अनाज की बर्बादी की बात आती है तो सरकार का वही घिसा पिटा जवाब होता है कि उसने जितना खरीदा, जितना सुरक्षित रखा और जितना बांटा, उसके मुकाबले ये बर्बादी कुछ नहीं है. हाल ही में 20 सितंबर को सरकार ने आंकड़ा जारी किया, जिसे अप्रैल में खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री स्वर्गीय रामविलास पासवान ने पेश किया था. पासवान ने संसद को सूचित किया था कि भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा खरीदा गया सिर्फ 0.02 लाख टन अनाज बर्बाद हुआ. लेकिन अनाज की बर्बादी के सवाल पर सरकार सिर्फ FCI का जिक्र करती है, जबकि जितने अनाज की बर्बादी होती है उसमें FCI का योगदान बहुत छोटा है.

बर्बादी: दावा बनाम सच्चाई

रामविलास पासवान ने संसद में कहा था, ‘आम लोगों की धारणा है कि FCI के गोदामों में अनाजों की भारी बर्बादी होती है, लेकिन हम इसे नियंत्रित करने में सक्षम हैं और बर्बादी को नगण्य कर दिया गया है. उन्होंने कहा कि 2015-16 में सरकार ने 62.3 मिलियन टन चावल और गेहूं खरीदा, जिसमें से 3,116 टन अनाज बर्बाद हो गया. ये कुल खरीद का सिर्फ 0.005% है. 2016-17 में 61 मिलियन टन की कुल खरीद में से सिर्फ 0.014% बर्बाद हुआ. 2017-18 और 2018-19 में अनाज की बर्बादी क्रमशः 0.003% और 0.006% रही. 2019-20 में सरकार ने 75.17 मिलियन टन अनाज खरीदा, जिसमें से 1,930 टन बर्बाद हुआ जो कुल खरीद का 0.002% है.”

इंडिया टुडे की टीमों ने अनाज की बर्बादी का जायजा लेने के लिए कई राज्यों का दौरा किया. मध्य प्रदेश के रीवा जिले में हमने पाया खरीद सिस्टम में लापरवाही बर्बादी की सबसे अहम वजह है. यहां 124 खरीद केंद्रों पर किसानों द्वारा लाए गए 11.4 लाख क्विंटल धान तौले जा चुके हैं. स्थानीय अधिकारियों का दावा है कि इसमें से 9.5 लाख क्विंटल पहले ही उठाया जा चुका है. लेकिन खरीदे गए धान पूरी तरह से अव्यवस्थित पड़े हैं. ये हालात तब हैं जब इन केंद्रों पर खरीद का जो लक्ष्य है, यह बमुश्किल उसका 50% है. इन केंद्रों पर 70,000 किसान पंजीकृत हैं. उनमें से लगभग 59,000 को मैसेज भेजा गया है कि 27 दिसंबर तक अपनी फसल ले आएं. रिकॉर्ड के अनुसार 17 दिसंबर तक सिर्फ 29,000 किसान इन केंद्रों पर पहुंचे थे.

अनाज की भारी बर्बादी
दावों और चुनौतियों से परे भारत अपने कृषि उत्पादन की बड़ी मात्रा में बर्बादी करता है. सरकार खुद पर लगे आरोपों के जवाब में एफसीआई के गोदामों में कम बर्बादी का हवाला देती है, लेकिन नुकसान बहुत व्यापक है. भारत में अनाज का कुल उत्पादन लगभग 30 करोड़ टन है और एफसीआई सिर्फ 8 करोड़ टन की खरीद करता है, जो भारत के कुल उत्पादन का करीब एक-चौथाई है. बचे हुए खाद्यान्न का ज्यादातर हिस्सा खुले में पड़ा रहता है.

कई तरह के अनाजों के मामले में भारती सर्वश्रेष्ठ उत्पादन करता है लेकिन दशकों का बर्बादी का चलन बना हुआ है. 2019-20 में कुल अनाज उत्पादन 292 मिलियन टन अनुमानित था, जबकि अनुमान के अनुसार, एक वर्ष में देश की कुल जनसंख्या को खिलाने के लिए 225-230 मिलियन टन की जरूरत होती है. फिर भी देश में बड़ी जनसंख्या को खाने का संकट रहता है और भारत इसके लिए संघर्ष कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) का अनुमान है कि भारत में जितने खाद्य पदार्थों का उत्पादन होता है, उसका 40 प्रतिशत से ज्यादा बर्बाद हो जाता है और इसकी लागत हर साल 14 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर हो सकती है.

सरकार ने कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए तीन कानून पास किए हैं जिनमें खरीद और भंडारण में निजी क्षेत्र की भागीदारी भी शामिल है. लेकिन संवाद की विफलता ने हरियाणा और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में किसानों को नाराज कर दिया है. सरकार किसानों से बातचीत की कोशिश कर रही है और अब बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि वह किसानों की मांगों और आशंकाओं को दूर करने के लिए कितनी तैयार है.

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