नहीं रहे रामविलास पासवान, बिहार की दलित राजनीति को दिया था नया व्याकरण

हिंदुस्तान के दिग्गज दलित नेता और केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान अब इस दुनिया में नहीं रहे. उनका 74 साल की उम्र में देहांत हो गया. रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने ट्वीट करके ये दुखद खबर दी. कल सुबह 10 बजे पटना में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. आज उनका पार्थिव शरीर पटना ले जाया जाएगा.

जिस वक्त बिहार में चुनाव हो रहा है, उस वक्त बिहार की राजनीति का एक बड़ा सितारा इस दुनिया को छोड़ के चला गया है. हिंदुस्तान की दलित राजनीति को नया व्याकरण देने वाले दलित नेता रामविलास पासवान ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया है. केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की 74 साल की उम्र में देहांत हुआ है।

बिहार की राजनीति की त्रिमूर्ति में एक मूर्ति रामविलास पासवान थे. पिछले 30 साल से बिहार की राजनीति जिन तीन चेहरों की धुरी पर नाचती रही उनमें से एक चेहरा रामविलास पासवान भी थे. लालू और नीतीश के साथ बिहार में समाजवाद की युवा तिकड़ी का एक इक्का बिखर गया. रामविलास पासवान चले गए. हमेशा-हमेशा के लिए.

रामविलास पासवान के लिए राजनीति का सफर एक खुरदुरा सफर रहा है. जमीन पर संघर्ष करके अपने लिए जगह बनाने वाले नेता थे वो. अपने इरादों के पत्थर को सियासत के आसमान में ऐसा उछाला कि उसमें सुराख कर दिया. ऐसा सुराख जो दलितों के लिए राजनीति के आंगन का दरवाजा खोल दे.

तभी तो बिहार में जगजीवन राम के बाद दलित चेहरे के रूप में कोई चेहरा चमकता रहा, वो रामविलास पासवान थे. उस चेहरे ने आज जिंदगी की चादर पूरी तरह तान ली. रह गयी है तो मौत की उदासी. रामविलास पासवान के ना रहने की टीस, जो उनके चाहने वालों के दिलोदिमाग में अरसे तक बैठी रहेगी.

जिस वक्त देश में कांग्रेस की हुकूमत का सूरज नहीं डूबता था. उस वक्त कांग्रेस के खिलाफ बिहार में कर्पूरी ठाकुर, जगदेव प्रसाद और बीपी मंडल जैसे नेताओं के साथ समाजवाद की अलख जगाने निकले थे रामविलास पासवान. 51 साल पहले मात्र 23 साल की उम्र में विधायक बने थे. उसके बाद उन्होंने पलटकर नहीं देखा. मंजिलें उनके कदमों के पीछे-पीछे भागती रहीं.

1977 में हाजीपुर से जब पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए तो रिकॉर्ड वोट से. उस जीत के रिकॉर्ड को 12 साल बाद खुद पासवान ने ही तोड़ा जब 1989 में वो हाजीपुर से ही चुनाव जीते थे. उन्होंने दलित नेता के रूप में ऐसे उभरे कि तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 43 साल के रामविलास पासवान को सीधे कैबिनेट मंत्री बना दिया.

उन्होंने उस दौर में राजनीति शुरु की थी जब दलितों के लिए ना समाज में जगह थी ना राजनीति में. वो दया के पात्र माने जाते थे. रामविलास ने उस दया को ईर्ष्या में बदल दिया. उसके बाद तो उन्होंने पलट कर नहीं देखा. पिछले 31 साल से हिंदुस्तान की सत्ता बदलती रही, लेकिन सत्ता की एक धुरी रामविलास बनते रहे.

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