राजस्थान के नागौर (Nagaur) जिले के हिम्मताराम भांबू को पर्यावरण संरक्षण के लिये ‘पद्मश्री’ सम्मान

राजस्थान के नागौर (Nagaur) जिले के धरती पुत्र हिम्मताराम भांबू को राजस्थान के रेतीले इलाकों को हरा -भरा करने और वन्य जीवों को बचाने के लिये  ‘पद्मश्री’ सम्मान

राजस्थान के नागौर (Nagaur) जिले के हिम्मताराम भांबू को पर्यावरण संरक्षण के लिये 'पद्मश्री' सम्मान
राजस्थान के नागौर (Nagaur) जिले के हिम्मताराम भांबू को पर्यावरण संरक्षण के लिये ‘पद्मश्री’ सम्मान

राजस्थान के नागौर (Nagaur) जिले के सुखवासी गांव में ढोल बतासे बज रहे हैं. वजह है गणतंत्र दिवस (Republic Day) की पूर्व संध्या पर आई एक बड़ी खुशखबरी (Big news). इसी गांव में जन्मे हिम्मताराम भांबू (Himmatram Bhanbu) को ‘पद्मश्री’ सम्मान (‘Padmashree’honor) दिए जाने की घोषणा की गई है.

राजस्थान के नागौर (Nagaur) जिले के हिम्मताराम भांबू को पर्यावरण संरक्षण के लिये  ‘पद्मश्री’ सम्मान

दूसरी बार दिल्ली से खुशखबरी आई है
इससे पहले इसी गांव के डॉक्टर लक्ष्मण सिंह राठौड़ को भारतीय मौसम विभाग का महानिदेशक बनाया गया तो गांव के लोग जमकर झूमे थे. राठौड़ सात साल तक भारतीय मौसम विभाग के मुखिया के बतौर देश-दुनिया में छाये रहे. पूरे पांच वर्षों तक विश्व मौसम संगठन के उपाध्यक्ष रहे राठौड़. अब भी देश-दुनिया के कई संगठनों से जुड़े हैं. लेकिन राठौड़ के लिये गणतंत्र दिवस की यह संध्या इसलिए खास है क्योंकि उनके करीबी दोस्त हिम्मताराम भांबू को ‘पद्मश्री’ दिए जाने का ऐलान किया गया है.

हिम्मताराम की हिम्मत को मिली दाद, ‘पीपल’ के पेड़ से ‘पद्मश्री’ तक का सफर

धरती पुत्र हिम्मता राम

धरती पुत्र हिम्मताराम भांबू को राजस्थान के रेतीले इलाकों को हरा -भरा करने और वन्य जीवों को बचाने के लिये यह सम्मान दिए जाने की घोषणा हुई है. भांबू को पद्मश्री दिए जाने की घोषणा पर खुशी जाहिर करते हुए डॉ. लक्ष्मण सिंह राठौड़ कहते हैं यह एक सच्चे प्रकृति प्रेमी का सम्मान है. हिम्मताराम भांबू ने वन्यजीवों को तो ज़िन्दगी दी ही साथ ही पांच लाख से ज्यादा पौधे लगाकर इस रेगिस्तानी इलाके का कायाकल्प भी किया है. भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक रहे राठौड़ के मुताबिक भांबू द्वारा लगाये गये पांच लाख पौधों में से साढ़े तीन लाख पौधे पेड़ का रूप ले चुके हैं. 63 साल के इस खेतीहर किसान ने अकेले अपने खेत में ही पंद्रह हजार से ज्यादा पौधे लगाये और करीब पांच सौ मोरों और अन्य पक्षियों को बसेरा दिया.

हिम्मताराम की हिम्मत को मिली दाद, 'पीपल' के पेड़ से 'पद्मश्री' तक का सफर
हिम्मताराम की हिम्मत को मिली दाद, ‘पीपल’ के पेड़ से ‘पद्मश्री’ तक का सफर

पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की मुहिम चलायी
सोसायटी फॉर रूरल इम्प्रूवमेंट के अध्यक्ष और भारतीय मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक राठौड़ इस सामाजिक संगठन के संगठन सचिव का दायित्व निभा रहे हिम्मताराम को सोसायटी का स्टार प्रचारक करार देते हैं. भांबू ने धार्मिक स्थलों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की मुहिम चलायी. उन्होंने पीपासर (नागौर) और करणी माता के देशनोक (बीकानेर) में सैंकड़ों पेड़ लगाकर पूरे इलाके को हरा भरा कर दिया. पीपासर में 1451 कृष्ण पक्ष की अष्टमी को एक राजपूत परिवार में विश्नोई सम्प्रदाय के संस्थापक जाम्भोजी (श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान) का जन्म हुआ था. इसी तरह साक्षात मां जगदम्बा की अवतार मानी जाने वाली चारण कुल की कुल देवी करणी देवी ने देवी पूजा कर देवी स्वरुप स्थान अर्जित किया था.

परिंदों को बसेरा और भोजन भी देते
हिम्मताराम कहते हैं कि दादी नैनी देवी द्वारा लगवाए गये उस पीपल को जैसे-जैसे बड़ा होते देखा वैसे-वैसे वृक्षारोपण की ललक बढ़ती गई. पीपल महज छाया ही नहीं देते वो परिंदों को बसेरा और भोजन भी देते हैं. इसलिए वन्यजीवों और पक्षियों से स्वाभाविक लगाव होता गया. पश्चिमी राजस्थान के कई जिलों में वृक्षारोपण कर चुके हिम्मताराम भांबू पद्मश्री की खबर से भावुक होकर कहते हैं मैं तो कोशिश कर रहा हूं. ये सम्मान तो 1974 में मेरे हाथों वह पीपल लगवाने वाली उस दादी मां का है. वन्यजीवों के संरक्षण की खातिर कई कानूनी लड़ाई लड़ दोषियों को जेल के सींखचों के पीछे पहुंचाने वाले भांबू को महीनेभर पहले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने व्यक्तिशः बुलाकर चर्चा की तो ग्रामीणों की खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन अब जबकि इसी शख्स को पद्मश्री दिए जाने का ऐलान हुआ है तो पूरे गांव में ढोल बतासे बज रहे हैं.

ग्रामदानी गांव सुखवासी
ग्रामदानी गांव सुखवासी के ग्रामीणों को हिम्मताराम भांबू जैसे लाडले के यहां जन्म दिए जाने पर फख्र है तो भांबू को ऐसे गांव में जन्म लेने पर गर्व है. जोधपुर रियासत के महाराजा बगत सिंह द्वारा बसाये गये इस गांव में 1952 में प्रसिद्द गांधीवादी और भूदान आंदोलन के जनक विनोबा भावे आये तो पूरे गांव ने सामूहिक निर्णय लेकर यहा की जमीन ग्राम दान के लिये दे दी थी. अब ग्रामदानी गांव के रूप में पहचाने जाने वाले इस गांव में राजस्व का हिसाब ग्राम सभा रखती है तो जमीन संबधी सारे फैसले भी ग्राम सभा ही लेती है. यहां के लोग न तो राजस्व विवाद के हल के लिये कोर्ट-कचहरी जाते हैं तो न ही यहां कोई पटवारी तैनात है. लगभग हर घर का एक सदस्य सरकारी नौकरी में है तो कई लोग अलग अलग तरीके से भूमिका अदा कर रहे हैं. इसी गांव के प्रह्लाद सिंह राठौड़ ने सरहद पर शहादत का इतिहास रचा था तो उदय सिंह राठौड़ ने राजस्थान के सबसे बड़े कर्मचारी संगठन का अध्यक्ष बन बरसों तक कर्मचारी राजनीति भी की थी. लेकिन अब गांव की चर्चा हो रही है तो सिर्फ और सिर्फ इसलिए क्योंकि गांव के लाडले हिम्मताराम को पद्मश्री मिला है.

Disclaimer: All information is gathered from various internet sources.

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